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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आपस में एकता का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (स्वेभिः) अपनों के साथ (नः) हमारा (संज्ञानम्) एक मत और (अरणेभिः) बाहिरवालों के साथ (संज्ञानम्) एकमत हो। (अश्विना) हे माता-पिता ! (युवम्) तुम दोनों (इह) यहाँ पर (अस्मासु) हम लोगों में (संज्ञानम्) एक मत (नि) निरन्तर (यच्छतम्) दान करो ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य माता-पिता आदिकों से शिक्षा पाकर वेद द्वारा संसार में एकता फैलावें ॥१॥
टिप्पणी: १−(संज्ञानम्) संगतं ज्ञानम्। ऐकमत्यम् (नः) अस्माकम् (स्वेभिः) स्वकीयैः पुरुषैः (अरणेभिः) अ० १।१९।३। विदेशिभिः (अश्विना) अ० २।२९।६। हे मातापितरौ (युवम्) युवाम् (इह) अस्मिन् संसारे (अस्मासु) (नि) निरन्तरम् (यच्छतम्) दत्तम् ॥
