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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कृतम्) कर्म (मे) मेरे (दक्षिणे) दाहिने (हस्ते) हाथ में और (जयः) जीत (मे) मेरे (सव्ये) बायें हाथ में (आहितः) स्थित है। मैं (गोजित्) भूमि जीतनेवाला, (अश्वजित्) घोड़े जीतनेवाला, (धनंजयः) धन जीतनेवाला और (हिरण्यजित्) सुवर्ण जीतनेवाला (भूयासम्) रहूँ ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पराक्रमी होकर सब प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त कर सुखी होवें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(कृतम्) विहितं कर्म (मे) मम (दक्षिणे) (हस्ते) पाणौ (जयः) उत्कर्षः (मे) (सव्ये) वामे (आहितः) स्थापितः (गोजित्) भूमिजेता (भूयासम्) (अश्वजित्) अश्वानां जेता (धनञ्जयः) अ० ३।१४।२। धनानां जेता (हिरण्यजित्) सुवर्णस्य जेता ॥
