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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे शत्रु !] (संलिखितम्) यथावत् लिखे हुए (त्वा) तुझको (अजैषम्) मैंने जीत लिया है, (उत) और (संरुधम्) रोक डालनेवाले को (अजैषम्) मैंने जीत लिया है। (यथा) जैसे (वृकः) भेड़िया (अविम्) बकरी को (मथत्) मथ डालता है, (एव) वैसे ही (ते) तेरे (कृतम्) कर्म को (मथ्नामि) मैं मथ डालूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - जिस दुष्ट जन का नाम राजकीय पुस्तकों में लिखा हो और बड़ा विघ्नकारी हो, उसको यथावत् दण्ड मिलना चाहिये ॥५॥
टिप्पणी: ५−(अजैषम्) अहं जितवानस्मि (त्वा) त्वां शत्रुम् (संलिखितम्) राजकीयपुस्तकेषु सम्यग् लिखितम् (अजैषम्) (उत) अपि च (संरुधम्) रुधेः-क्विप्। निरोधकम्। विघ्नकारिणम् (अविम्) अजाम् (वृकः) अरण्यश्वा (यथा) (मथत्) मथ्नाति (एव) एवम् (मथ्नामि) नाशयामि (ते) तव (कृतम्) कर्म ॥
