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मु॒ग्धा दे॒वा उ॒त शुनाऽय॑जन्तो॒त गोरङ्गैः॑ पुरु॒धाऽय॑जन्त। य इ॒मं य॒ज्ञं मन॑सा चि॒केत॒ प्र णो॑ वोच॒स्तमि॒हेह ब्र॑वः ॥
पद पाठ
मुग्धा: । देवा: । उत । शुना । अयजन्त । उत । गो: । अङ्गै: । पुरुऽधा । अयजन्त । य: । इमम् । यज्ञम् । मनसा । चिकेत । प्र । न: । वोच:। तम् । इह । इह । ब्रव: ॥५.५॥
अथर्ववेद » काण्ड:7» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:5
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) विद्वान् लोग [ईश्वर की सीमा के विषय में] (मुग्धाः) मूढ़ होकर (उत) भी (शुना) ज्ञान से [परमात्मा को] (अयजन्त) मिले हैं, (उत) और (गोः) वेदवाणी के (अङ्गैः) अङ्गों से [उसे] (पुरुधा) विविध प्रकार से (अयजन्त) पूजा है। (यः) जिस आपने (इमम् यज्ञम्) इस पूजनीय परमेश्वर को (मनसा) विज्ञान के साथ (चिकेत) जाना है, और जिस तूने (नः) हमें (प्र) अच्छे प्रकार (वोचः) उपदेश किया है, सो तू (तम्) उस परमेश्वर का (इह इह) यहाँ पर ही (ब्रवः) उपदेश कर ॥५॥
भावार्थभाषाः - ऋषि मुनि लोग असीम, अनादि, अनन्त, परमेश्वर को सब से बलिष्ठ जान कर ही विज्ञानपूर्वक आगे बढ़ते और उसका उपदेश करके संसार को आगे बढ़ाते हैं ॥५॥ इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध आ चुका है-अ० ७।२।१ ॥
टिप्पणी: ५−(मुग्धाः) मोहिताः सन्तः (देवाः) विद्वांसः (उत) अपि (शुना) शुन गतौ-क्विप्। ज्ञानेन। शुनं सुखम्-निघ० ७।६। (अयजन्त) संगतवन्तः परमात्मानम् (गोः) वेदवाचः। गौः=वाक्-निघ० १।११। (अङ्गैः) (पुरुधा) बहुधा (अयजन्त) पूजितवन्तः। अन्यत्पूर्ववत्-अ० ७।२।१।
