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या वि॒श्पत्नीन्द्र॒मसि॑ प्र॒तीची॑ स॒हस्र॑स्तुकाभि॒यन्ती॑ दे॒वी। विष्णोः॑ पत्नि॒ तुभ्यं॑ रा॒ता ह॒वींषि॒ पतिं॑ देवि॒ राध॑से चोदयस्व ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या । विश्पत्नी । इन्द्रम् । असि । प्रतीची । सहस्रऽस्तुका । अभिऽयन्ती । देवी । विष्णो: । पत्नि । तुभ्यम् । राता । हवींषि । पतिम् । देवि । राधसे । चोदयस्व ॥४८.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:7» सूक्त:46» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

स्त्रियों के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (या) जो (विश्पत्नी) सन्तानों की पालनेवाली, (प्रतीची) निश्चित ज्ञानवाली, (सहस्रस्तुका) सहस्रों स्तुतिवाली, (अभियन्ती) चारों ओर चलती हुई (देवी) देवी तू (इन्द्रम्) ऐश्वर्य को (असि=अससि) ग्रहण करती है। (विष्णोः) पत्नि) हे कामों में व्यापक वीर पुरुष की पत्नी ! (तुभ्यम्) तेरे लिये (हवींषि) देने योग्य पदार्थ (राता) दिये गये हैं, (देवि) हे देवी ! (पतिम्) अपने पति को (राधसे) सम्पत्ति के लिये (चोदयस्व) आगे बढ़ा ॥३॥
भावार्थभाषाः - स्त्रियाँ गृहकार्य में चतुर रह कर अपने पतियों द्वारा धनसंचय कराकर सन्तान पालन आदि कार्य करती रहें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(या) (विश्पत्नी) प्रजानां पालयित्री (इन्द्रम्) ऐश्वर्यम् (असि) अस ग्रहणे। अससि गृह्णासि (प्रतीची) अ० ७।३८।३। निश्चितज्ञानयुक्ता। (सहस्रस्तुका) म० १। ष्टुञ्-कक्। असंख्यस्तुतियुक्ता (अभियन्ती) अभितो गच्छन्ती (देवी) व्यवहारकुशला (विष्णोः) कार्येषु व्यापकस्य पत्युः (पत्नि) (तुभ्यम्) (राता) दत्तानि (हवींषि) दातव्यानि वस्तूनि (पतिम्) स्वामिनम् (देवि) (राधसे) धनाय-निघ० २।१०। (चोदयस्व) प्रेरयस्व। प्रगमय ॥