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या सु॑बा॒हुः स्व॑ङ्गु॒रिः सु॒षूमा॑ बहु॒सूव॑री। तस्यै॑ वि॒श्पत्न्यै॑ ह॒विः सि॑नीवा॒ल्यै जु॑होतन ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या । सुऽबाहु: । सुऽअङ्गुरि: । सुऽसूमा । बहुऽसूवरी । तस्यै । विश्पत्न्यै । हवि: । सिनीवाल्यै । जुहोतन ॥४८.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:7» सूक्त:46» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

स्त्रियों के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (या) जो (सुबाहुः) शुभकर्मों में भुजा रखनेवाली, (स्वङ्गुरिः) सुन्दर व्यवहारों में अङ्गुरी रखनेवाली, (सुषूमा) भली-भाँति आगे चलनेवाली, और (बहुसूवरी) बहुत प्रकार से वीरों को उत्पन्न करनेवाली, [माता है], (तस्यै) उस (विश्पत्न्यै) प्रजाओं की पालनेवाली, (सिनीवाल्यै) बहुत अन्नवाली [गृहपत्नी] को (हविः) देने योग्य पदार्थ का (जुहोतन) दान करो ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो स्त्रियाँ गृहकार्य में चतुर वीर सन्तान उत्पन्न करनेहारी हैं, उनका सत्कार सब मनुष्यों को सदा करना चाहिये ॥२॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है−२।३२।७ ॥
टिप्पणी: २−(या) पत्नी (सुबाहुः) शुभकर्मसु बाहू यस्याः सा (स्वङ्गुरिः) शोभनेषु व्यवहारेषु अङ्गुरयो यस्याः सा (सुषूमा) इषियुधीन्धि०। उ० १।१४५। षू प्रेरणे-मक्, टाप्। सुप्रेरयित्री। सुनेत्री (बहुसूवरी) षू प्रसवे-क्वनिप्। वनो र च। पा० ४।१।७। ङीब्रेफौ। बहुविधं वीराणां जनयित्री (तस्यै) (विश्पत्न्यै) प्रजानां पालयित्र्यै (हविः) दातव्यं पदार्थम् (सिनीवाल्यै) म० १। अन्नवत्यै (जुहोतन) तप्तनप्तनथनाश्च। पा० ७।१।४५। इति हु दानादिषु लोटि तस्य तनप्। जुहुत। दत्त ॥