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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईर्ष्या दोष के निवारण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्य) इस (दहतः) जलती हुई (अग्नेः इव) अग्नि के समान, (पृथक्) अथवा (दहतः) जलती हुई (दावस्य) वन अग्नि के [समान] (एतस्य) इस पुरुष की (एताम्) इस (ईर्ष्याम्) ईर्ष्या को (शमय) शान्त कर दे, (इव) जैसे (उद्ना) जल से (अग्निम्) आग को ॥२॥
भावार्थभाषाः - ईर्ष्यालु अर्थात् दूसरे के अभ्युदय को न सहनेवाला मनुष्य आग के समान भीतर ही भीतर जल कर राख के समान नाश हो जाता है, इससे वह ईर्ष्या दोष को ऐसा शान्त रक्खे, जैसे अग्नि को जल से ॥२॥
टिप्पणी: २−(अग्नेः) पावकस्य (इव) यथा (अस्य) पुरोवर्तिनः (दहतः) ज्वलतः (दावस्य) टुदु उपतापे-घञ्। वनाग्नेः (दहतः) (पृथक्) भिन्ने। अथवा (एताम्) (एतस्य) ईर्ष्यालोः पुरुषस्य (ईर्ष्याम्) मत्सरबुद्धिम् (उद्ना) अ० ३।१२।४। उदकेन (अग्निम्) (इव) (शमय) शान्तां कुरु ॥
