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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईर्ष्या दोष के निवारण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे भयनिवारक ज्ञान !] (सिन्धुतः) समुद्र [के समान गम्भीर स्वभाववाले] (विश्वजनीनात्) सब जनों के हितकारी (जनात्) उनके पास से (दूरात्) दूर देश से (परि) सब प्रकार (आभृतम्) लाये हुए और (उद्भृतम्) उत्तमता से पुष्ट किये हुए (त्वा) तुझको (ईर्ष्यायाः) दाह का (नाम) प्रसिद्ध (भेषजम्) भयनिवारक औषध (मन्ये) मैं मानता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे मनुष्य बहुमूल्य उत्तम औषध को दूर देश से लाते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग सर्वहितकारी विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करके ईर्ष्या छोड़कर दूसरों की उन्नति में अपनी उन्नति समझें ॥१॥
टिप्पणी: १−(जनात्) लोकात् (विश्वजनीनात्) आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात् खः। पा० ५।१।९। इति ख। सर्वजनहितात् (सिन्धुतः) समुद्र इव गम्भीरस्वभावात् (परि) सर्वतः (आभृतम्) हस्य भः। आहृतम् (दूरात्) दूरदेशात् (त्वा) त्वां भेषजम् (मन्ये) जानामि (उद्भृतम्) उत्तमतया पोषितम् (ईर्ष्यायाः) अ० ६।१८।१। परोत्कर्षासहनतायाः (नाम) प्रसिद्धम् (भेषजम्) भयनिवारकमौषधं ज्ञानमित्यर्थः ॥
