विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (दिव्यम्) दिव्य गुणवाले, (पयसम्) गतिवाले, (बृहन्तम्) विशाल, (अपाम्) अन्तरिक्ष के (गर्भम्) गर्भसमान बीच में रहनेवाले, (ओषधीनाम्) अन्न आदि ओषधियों के (वृषभम्) बरसानेवाले, (अभीपतः) सब ओर जलवाले मेघ से (वृष्ट्या) वृष्टिद्वारा (तर्पयन्तम्) तृप्त करनेवाले, (रयिष्ठाम्) धन के बीच ठहरनेवाले, (सुपर्णम्) सुन्दर किरणोंवाले सूर्य के समान विद्वान् पुरुष को (नः) हमारे (गोष्ठे) गोठ वा वार्तालाप स्थान में (आ) लाकर (स्थापयाति) [यह पुरुष] स्थान देवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य सब लोकों के बीच ठहर कर भूगोल आदि लोकों को प्रकाश, वृष्टि आदि से सुखी करता है, वैसे ही जो विद्वान् ज्ञान और उपदेश से सब जनों को आनन्दित करे, उसका सब लोग आदर करें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१।१६४।५२ ॥