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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह में प्रतिज्ञा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे पति !] तू (यदि वा) चाहे (तिरोजनम्) मनुष्यों से अदृष्ट स्थान में (असि) है, (यदि वा) चाहे (नद्यः) नदियाँ (तिरः) बीच में हैं। (इयम्) यह [प्रतिज्ञारूप] (ओषधिः) ओषधि (मह्यम्) मेरे लिये (ह) ही (त्वाम्) तुझको (बध्वा इव) बाँध कर जैसे (न्यानयत्) लेआवे ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य वाणिज्य, युद्ध आदि के लिये दूर परदेशों में जाकर अपने देश को लौटा करें ॥५॥ इति तृतीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: ५−(यदि वा) अथवा (असि) भवसि (तिरोजनम्) क्रियाविशेषणमेतत्। तिरोऽन्तर्हितोऽदृष्टो जनो यस्मिन्स्थाने तस्मिन् (यदि वा) (नद्यः) सरितः (तिरः) तिरोभूत्वा व्यवधानेन वर्तन्ते (इयम्) प्रतिज्ञारूपा (ह) एव (मह्यम्) मदर्थम् (त्वाम्) पतिम् (ओषधिः) (बद्ध्वा) निगृह्य (इव) (न्यानयत्) नयतेर्लेटि, अडागमः। नितरामानयेत् ॥
