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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह में प्रतिज्ञा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं (न इत्) अभी (वदामि) बोल रही हूँ, (त्वम् त्वम्) तू तू (अह) भी (सभायाम्) सभा में (वद) बोल। (त्वम्) तू (केवलः) केवल (मम इत्) मेरा ही (असः) होवे, (चन) और (अन्यासाम्) दूसरी स्त्रियों का (न कीर्तयाः) तू न ध्यान करे ॥४॥
भावार्थभाषाः - वधू और वर पञ्चों के सन्मुख दृढ़ प्रतिज्ञा करके सदाचारी रह कर धर्म पर चलते रहें ॥४॥ इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध भेद से आ चुका है-अ० ७।३७।१ ॥
टिप्पणी: ४−(अहम्) वधूः (वदामि) प्रतिजानामि (न) सम्प्रति-निरु० ७।३१। (इत्) एव (त्वम् त्वम्) वीप्सायां द्विर्वचनम् (सभायाम्) विद्वत्समाजे (अह) एव (वद) प्रतिजानीहि (मम) (इत्) एव। अन्यत्पूर्ववत् अ० ७।३७।१ ॥
