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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह में प्रतिज्ञा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे वधू !] (प्रतीची) निश्चित ज्ञानवाली तू (सोमम्) चन्द्रमा को, (उत) और (प्रतीची) प्रतिज्ञापूर्वक मार्गवाली तू (सूर्यम्) सूर्य को, और (प्रतीची) प्रतिष्ठापूर्वक उपायवाली तू (विश्वान्) सब (देवान्) उत्तम गुणों को (असि-अससि) प्राप्त होती है, (ताम् त्वा) उस तुझको (अच्छावदामसि) हम स्वागत करके बुलाते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - सब स्त्री-पुरुष चन्द्रसमान शान्तस्वभाव, सूर्यसमान तेजस्विनी और सर्वगुणवती वधू का यथावत् आदर करें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(प्रतीची) प्रति+अञ्चु गतौ-क्विन्। अञ्चतेश्चोपसंख्यानम्। वा० पा० ४।१।६। ङीप्। अधः। पा० ६।४।१३८। अकारलोपः। चौ। पा० ६।४।२२२। पूर्वपदस्य दीर्घः। प्रति निश्चयेन गतिमती ज्ञानवती (सोमम्) चन्द्रम्, चन्द्रतुल्यशान्तस्वभावम् (असि) अससि स्थाने असि रूपम्। अस ग्रहणे गतौ च-लट्। गच्छसि। प्राप्नोषि (प्रतीची) प्रतिज्ञया गतिमती मार्गवती (उत) अपि च (सूर्यम्) सूर्यतुल्यप्रतापम् (प्रतीची) प्रति प्रतिष्ठया गतिमती प्रयत्नवती (विश्वान्) सर्वान् (देवान्) दिव्यगुणान् (ताम्) तथाभूताम् (त्वा) त्वां वधूम् (अच्छावदामसि) अ० ६।५९।३। अच्छ सत्कारेण आह्वयामः ॥
