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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह में प्रतिज्ञा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (येन) जिस [उपाय] से (आसुरी) बुद्धिमानों वा बलवानों के हित करनेवाली बुद्धि ने (इन्द्रम्) बड़े ऐश्वर्यवाले मनुष्य को (देवेभ्यः) उत्तम गुणों के लिये (परि) सब ओर से (निचक्रे) नियत किया था। (तेन) उसी [उपाय] से (अहम्) मैं (त्वम्) तुझको (नि कुर्वे) नियत करती हूँ, (यथा) जिस से मैं (ते) तेरी (सुप्रिया) बड़ी प्रीति करनेवाली (असानि) रहूँ ॥२॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार मनुष्य पूर्वकाल में बुद्धि और बल द्वारा उत्तम गुण प्राप्त करते रहे हैं, उसी प्रकार दम्पती प्रयत्न करके परस्पर प्रीति के साथ उत्तम गुण प्राप्त करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(येन) उपायेन (निचक्रे) नियतं कृतवती (आसुरी) अ० १।२४।१। असुः प्रज्ञा प्राणो वा-रो मत्वर्थीयः-असुरत्वं प्रज्ञावत्त्वं प्राणवत्त्वं वा-निरु० १०।३४। मायायामण्। पा० ४।४।१२४। असुर-अण्। प्रज्ञावतां बलवतां वा हिता माया प्रज्ञा-निघ० ३।९। (इन्द्रम्) परमैश्वर्ययुक्तं नरम् (देवेभ्यः) उत्तमगुणानां प्राप्तये (परि) सर्वतः (तेन) उपायेन (नि) नियतम् (कुर्वे) करोमि (त्वाम्) वरम् (अहम्) वधूः (यथा) (ते) तव (असानि) भवानि (सुप्रिया) सुप्रीतिकरा ॥
