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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाह में प्रतिज्ञा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे स्वामिन् !] (मनुजातेन) मननशील मनुष्यों में प्रसिद्ध (मम वाससा) अपने वस्त्र से (त्वा) तुझे (अभि दधामि) मैं बाँधती हूँ। (यथा) जिससे तू (केवलः) केवल (मम) मेरा (असः) होवे, (चन) और (अन्यासाम्) अन्य स्त्रियों का (न कीर्तयाः) तू न ध्यान करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - विवाह में विद्वानों के बीच वस्त्र का गठबन्धन करके वधू और वर दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि पत्नी पतिव्रता और पति पत्नीव्रत होकर गृहस्थ आश्रम को प्रीतिपूर्वक निबाहें ॥१॥
टिप्पणी: १−(त्वा) पतिम् (मनुजातेन) मननशीलेषु मनुष्येषु प्रसिद्धेन (अभि दधामि) अभिपूर्वो दधातिर्बन्धने। बध्नामि (वाससा) वस्त्रेण यथा येन प्रकारेण (असः) असेलेर्टि, अडागमः। भवेः (मम) (केवलः) असाधारणः (न) निषेधे (अन्यासाम्) अन्यस्त्रीणाम् (कीर्तयाः) कॄत संशब्दने, णिचि। उपधायाश्च। पा० ७।१।१०१। इत्वम्। उपधायां च। पा० ८।२।७८। इति दीर्घः, लेटि आडागमः। कीर्तयेः। कीर्तनं ध्यानं कुर्याः (चन) चार्थे ॥
