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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्त्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (ते) तेरी (इमाः) यह (याः) जो (शतम्) सौ [बहुत] (हिराः) सूक्ष्म नाड़ियाँ (उत) और (सहस्रम्) सहस्र [अनेक] (धमनीः) स्थूल नाड़ियाँ हैं। (ते) तेरी (तासाम्) उन (सर्वासाम्) सब [नाड़ियों] के (बिलम्) छिद्र को (अहम्) मैं [प्रजागण] ने (अश्मना) व्यापक [अथवा पाषाण समान दृढ़] उपाय से (अपि) निश्चय करके (अधाम्) पुष्ट किया है ॥२॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण राजा की शारीरिक और आत्मिक शक्ति बढ़ा कर उसे सदा प्रसन्न रक्खें ॥२॥
टिप्पणी: २−(इमाः) शरीरस्थाः (याः) (ते) त्वदीयाः (शतम्) बहुसंख्याकाः (हिराः) अ० १।१७।१। सूक्ष्मा नाड्यः (सहस्रम्) अनेकाः (धमनीः) अ० १।१७।२। स्थूला नाड्यः (उत) अपि (तासाम्) (ते) त्वदीयानाम् (सर्वासाम्) नाडीनाम् (अहम्) प्रजागणः (अश्मना) अ० १।२।२। व्यापकेनोपायेन। यद्वा पाषाणवद्दृढोपायेन (बिलम्) बिल भेदने-क। बिलं भरं भवति बिभर्त्तेः-निरु० २।१७। छिद्रम् (अपि) निश्चयेन (अधाम्) धाञो लुङ्। पोषितवानस्मि ॥
