सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे शूरवीर !] (ते) तेरे (मर्माणि) मर्मों को (वर्मणा) कवच से (छादयामि) मैं [सेनापति] ढाँकता हूँ, (सोमः) ऐश्वर्यवान् (राजा) राजा [कोशाध्यक्ष] (त्वा) तुझको (अमृतेन) अमृत [मृत्युनिवारक, शस्त्र, अस्त्र, वस्त्र, अन्न, औषध आदि] से (अनु) निरन्तर (वस्ताम्) ढके। (वरुणः) श्रेष्ठ पुरुष [चतुर मार्गदर्शक] (ते) तेरे लिये (उरोः) चौड़े से (वरीयः) अधिक चौड़ा [स्थान] (कृणोतु) करे, (जयन्तम्) विजयी (त्वा अनु) तेरे पीछे (देवाः) विजय चाहनेवाले पुरुष (मदन्तु) आनन्द पावें ॥१॥
भावार्थभाषाः - सर्वाधीश मुख्य सेनापति अधिकारियों द्वारा योद्धाओं को समस्त आवश्यक सामग्री देकर उत्साहित करे, जिससे सब वीर आनन्दध्वनि करते हुए विजयी होवें ॥१॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-म० ६।७५।१८; यजुः०−१७।४९; साम० उ० ९।३।८ ॥ इति दशमोऽनुवाकः ॥ इति सप्तदशः प्रपाठकः ॥ इति सप्तमं काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाड़ाधिष्ठितबड़ोदेपुरीगतश्रावणमासपरीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये सप्तमं काण्डं समाप्तम् ॥