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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोगनिवारण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रूराय) घातक (च्यवनाय) पतित, (नोदनाय) ढकेलनेवाले, (धृष्णवे) ढीठ [शत्रु] को (नमः) वज्र (शीताय) शीत [समान] (पूर्वकामकृत्वने) पहिली कामनायें काटनेवाले [वैरी] को (नमः) वज्र [होवे] ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे अति शीत खेती आदि को हानि करता है, वैसे हानिकारक शत्रु को दण्ड देना चाहिये ॥१॥ इस सूक्त का मिलान अ० १।२५।४। से करो ॥
टिप्पणी: १−(नमः) वज्रः-निघ० २।२०। (रूराय) अ० १।२५।४। घातकाय (च्यवनाय) अनुदात्तेतश्च हलादेः। पा० ३।२।१४९। च्युङ् गतौ-युच्। च्युताय पतिताय (नोदनाय) णुद प्रेरणे-युच्। प्रेरकाय। विक्षपयित्रे (धृष्णवे) अ० १।१३।४। प्रगल्भाय शत्रवे (नमः) (शीताय) अ० १।२५।४। हिमसदृशाय (पूर्वकामकृत्वने) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७५। कृती छेदने-क्वनिप्। नेड्वशि कृति। पा० ७।२।२८। इट्प्रतिषेधः। प्रथमाभिलाषाणां कर्तित्रे। छेदकाय वैरिणे ॥
