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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
व्यवहारसिद्धि का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इदम्) यह (नमः) नमस्कार (उग्राय) तेजस्वी (बभ्रवे) पोषक [परमेश्वर] को है, (यः) जो (अक्षेषु) व्यवहारों में (तनूवशी) शरीरों का वश में रखनेवाला है। (घृतेन) प्रकाश के साथ (कलिम्) गिननेवाले [परमेश्वर] को (शिक्षामि) मैं सीखता हूँ, (सः) वह (नः) हमें (ईदृशे) ऐसे [कर्म] में (मृडाति) सुखी करे ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सर्वनियन्ता, सर्वज्ञ परमेश्वर की उपासना करके उत्तम कर्मों के साथ सुख भोगें ॥१॥
टिप्पणी: १−(इदम्) (उग्राय) तेजस्विने (बभ्रवे) अ० ४।२९।२। पोषकाय (नमः) नमस्कारः (यः) परमेश्वरः (अक्षेषु) अ० ४।३८।४। व्यवहारेषु (तनूवशी) अ० १।७।२। शरीराणां वशयिता (घृतेन) प्रकाशेन (कलिम्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। कल शब्दसंख्यानयोः-इन्। गणकम्। गणपतिं परमेश्वरम् (शिक्षामि) शिक्ष विद्योपादाने-लट्, परस्मैपदं छान्दसम्। शिक्षे। अभ्यस्यामि (सः) कलिः (नः) अस्मान् (मृडाति) सुखयेत् (ईदृशे) एवं प्रकारे पुण्यकर्मणि ॥
