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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गृहस्थ आश्रम का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (त्वा) तुझको (मम) अपने (दोषणिश्रिषम्) भुजा पर आश्रयवाली और (हृदयश्रिषम्) हृदय में आश्रयवाली (कृणोमि) मैं करता हूँ। (यथा) जिससे (मम) मेरे (कृतौ) कर्म वा बुद्धि में (असः) तू रहे, (मम) मेरे (चित्तम्) चित्त में (उपायसि) तू पहुँचती है ॥२॥
भावार्थभाषाः - पति और पत्नी परस्पर पुरुषार्थ और प्रीतिपूर्वक गृहस्थ आश्रम को यथावत् सिद्ध करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(मम) (त्वा) त्वाम् (दोषणिश्रिषम्) श्रिषु दाहे, श्रिष आलिङ्गने इति सायण−क्विप्। पद्दन्नोमास्०। पा० ६।१।६३। इति दोः शब्दस्य दोषन्। सप्तम्या अलुक्। बाहौ पुरुषार्थे आश्रिताम् (कृणोमि) करोमि (हृदयश्रिषम्) हृदयाश्रिताम् (यथा) यस्मात्कारणात्। अन्यद् व्याख्यातम्। अ० १।३४।२। (मम) (कृतौ) कर्मणि बुद्धौ वा (असः) त्वं भूयाः (मम) (चित्तम्) अन्तःकरणम् (उपायसि) उप+आङ्+अय गतौ। उपागच्छसि। आदरेण प्राप्नोषि ॥
