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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सुख की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विजयी देवताओ ! (येन) जिस [मार्ग] से (असुराणाम्) असुरों के (ओजांसि) बलों को (अवृणीध्वम्) तुम ने रोका है, (तेन) उसी से (नः) हमें (शर्म) सुख (यच्छत) दान करो ॥३॥
भावार्थभाषाः - शूर वीर पुरुष दुष्टों के जीतने में परस्पर सदा सहायक रहें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(येन) वेदमार्गेण (देवाः) विजिगीषवः शूराः (असुराणाम्) सुरविरोधिनां शत्रूणाम् (ओजांसि) बलानि (अवृणीध्वम्) वृञ् संवरणे−लङ्। यूयं निवारितवन्तः स्थ (तेन) पथा (नः) अस्मभ्यम् (शर्म) सुखम् (यच्छत्) पाघ्राध्मा०। पा० ३।७८। इति दाण् दाने, यच्छादेशः। दत्त ॥
