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येन॑ सो॒मादि॑तिः प॒था मि॒त्रा वा॒ यन्त्य॒द्रुहः॑। तेना॒ नोऽव॒सा ग॑हि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

येन । सोम । अदिति: । पथा । मित्रा: । वा । यन्ति । अद्रुह: । तेन । न: । अवसा । आ । गहि ॥७.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:7» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सुख की प्राप्ति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे बड़े ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर ! (येन पथा) जिस मार्ग से (अदितिः) अदीन पृथिवी (वा) और (मित्राः) प्रेरणा करने हारे सूर्य आदि लोक (अद्रुहः) द्रोहरहित होकर (यन्ति) चलते हैं। (तेन) उसी से (अवसा) रक्षा के साथ (नः) हमें (आ गहि) आकर प्राप्त हो ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सत्य वेदपथ पर चल कर प्रीतिपूर्वक परस्पर रक्षा करें, जैसे सूर्यादि लोक परस्पर आकर्षण से परस्पर उपकार करते हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(येन) (सोम) परमैश्वर्यवन् (अदितिः) अ० २।२८।४। अदीना पृथिवी (पथा) मार्गेण (मित्राः) अ० ३।८।१। डुमिञ् प्रक्षेपणे−क्त्र। प्रेरकाः सूर्यादिलोकाः (वा) चार्थे (यन्ति) संचरन्ति (अद्रुहः) अद्रोग्धारः सन्तः (तेन) पथा (नः) अस्मान् (अवसा) रक्षणेन सह (आ गहि) आगच्छ ॥