पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रु के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परम ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर ! (यः) जो कोई (सनाभिः) अपना सपिण्डी (च) और (यः) जो कोई (निष्ट्यः) म्लेच्छ (नः) हमें (अभिदासति) सताता है, (तस्य) उसके (बलम्) बल को (वधत्मना) अपने वज्ररूप स्वभाव से (अप तिर) गिरा दे, (इव) जैसे (मही) बड़ा (द्यौः) प्रकाशमान सूर्य [अन्धकार को] ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक बल बढ़ा कर प्रत्येक शत्रु का नाश करे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यः) शत्रुः (नः) अस्मान् (सोम) परमैश्वर्यवन् (अभिदासति) अ० ४।१९।५। अभितो हिनस्ति (सनाभिः) एकदेहोत्पन्नत्वे तुल्यनाभिता। समाननाभिः। ज्ञातिः। सपिण्डः (यः) (च) (निष्ट्यः) अ० ३।३।६। निस्−त्यप्। म्लेच्छः (अप तिर) नाशय (तस्य) शत्रोः (बलम्) सामर्थ्यम् (मही) महती। विस्तीर्णा (इव) यथा (द्यौः) प्रकाशमानः सूर्यः (वधत्मना) हनश्च वधः। पा० ३।४।७६। इति हन−अप्, वधादेशः मन्त्रेष्वाङ्यादेरात्मनः। पा० ६।४।१४१। इति आकारलोपः। वज्ररूपेण स्वभावेन ॥
