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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
धन और जीवन की वृद्धि का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) जिस पुरुष के (गृहे) घर में (हविः) देने और लेने योग्य व्यवहार (कृण्मः) हम करते हैं, (तम्) उस को (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! (त्वम्) तू (वर्धय) बढ़ा। (तस्मै) उसी पुरुष के लिये (अयम्) यह (सोमः) ऐश्वर्यवान् (च) और (ब्रह्मणः) वेदविद्या का (पतिः) रक्षक पुरुष (अधि) अधिक (ब्रवत्) कथन करे ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सबका हितैषी होवे, वह परमेश्वर के अनुग्रह से वृद्धि करके ऐश्वर्यशाली विद्वानों में बड़ाई पावे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यस्य) धार्मिकस्य (कृण्मः) कुर्मः (हविः) दातव्यं ग्राह्यं कर्म (गृहे) निवासे (तम्) (अग्ने) हे सर्वव्यापक परमात्मन् (वर्धय) समर्धय (त्वम्) (तस्मै) पूर्वोक्ताय पुरुषाय (सोमः) ऐश्वर्यवान् पुरुषः (अधि) अधिकम् (ब्रवत्) कथयेत् (अयम्) प्रसिद्धः (च) (ब्रह्मणः) वेदस्य (पतिः) पालकः ॥
