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इन्द्रे॒मं प्र॑त॒रं कृ॑धि सजा॒ताना॑मसद्व॒शी। रा॒यस्पोषे॑ण॒ सं सृ॑ज जी॒वात॑वे ज॒रसे॑ नय ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र । इमम्‌ । प्रऽतरम् । कृधि । सऽजातानाम् । असत् । वशी । राय: । पोषेण । सम् । सृज। जीवातवे । जरसे । नय ॥५.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

धन और जीवन की वृद्धि का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर ! (इमम्) इस पुरुष को (प्रतरम्) अधिक ऊँचा (कृधि) कर, यह (सजातानाम्) समान जन्मवाले बन्धुओं का (वशी) वश में रखनेवाला, अधिष्ठाता (असत्) होवे। (रायः) धन की (पोषेण) पुष्टि से (सम् सृज) संयुक्त कर और (जीवातवे) बड़े जीवन के लिये और (जरसे) स्तुति के लिये (नय) आगे बढ़ा ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा पालन करके अपने बन्धुओं को उत्तम बर्ताव से वश में रख कर धन की वृद्धि करके पूर्ण यश प्राप्त करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् भगवन् (इमम्) धर्मात्मानम् (प्रतरम्) अधिकप्रवृद्धम् (कृधि) कुरु (सजातानाम्) समानजन्मनां बन्धूनाम् (असत्) भवेत् (वशी) वशयिता। अधिष्ठाता (रायः) धनस्य (पोषेण) वर्धनेन (सम् सृज) संयोजय (जीवातवे) जीवेरातुः। उ० १।७८। इति जीव प्राणधारणे−आतु। चिरजीवनाय (जरसे) अ० १।३०।२। स्तुतये (नय) प्रेरय ॥