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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
धन और जीवन की वृद्धि का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (घृतेन) घृत से (आहुत) आहुति पाये हुए (अग्ने) हे अग्नि के समान तेजस्वी परमेश्वर ! (एनम्) इस पुरुष को (उत्तरम्) अधिक ऊँचा (उत् नय) उठा। (एनम्) इस को (वर्चसा) तेज से (सम् सृज) संयुक्त कर, (च) और (प्रजया) प्रजा से (बहुम्) प्रवृद्ध (कृधि) कर ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से तेजस्वी होकर अपना सामर्थ्य और प्रजा बढ़ावे ॥१॥
टिप्पणी: १−(उत् नय) उर्ध्वं प्रापय (एनम्) उपासकम् (उत्तरम्) उन्नतं पदम् (अग्ने) अग्निवत्तेजस्विन् परमात्मन् (घृतेन) आज्येन (आहुत) प्राप्ताहुते (सम् सृज) संयोजय (एनम्) (वर्चसा) तेजसा (प्रजया) सन्तानभृत्यादिना (च) (बहुम्) लङ्घिबंह्योर्नलोपश्च। उ० १।२९। इति बहि वृद्धौ−कु। प्रवृद्धम् (कृधि) कुरु ॥
