प्रलय और सृष्टिविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्यश्रितः) सूर्य में ठहरी हुई (सुपर्णाः) अच्छे प्रकार पालन करनेवाली वा बड़ी शीघ्रगामी किरणों ने (आखरे) खननयोग्य (द्यवि) अन्तरिक्ष में (उप=उपेत्य) मिलकर (वाचम्) शब्द (अक्रत) किया, और (कृष्णाः) रस खैंचनेवाली (इषिराः) चलनेवाली [उन किरणों] ने (अनर्त्तिषुः) नृत्य किया। (यत्) जब वे (उपरस्य) मेघ की (निष्कृतिम्) रचना की ओर (नि) नियम से (नियन्ति) झुकती हैं, [तब] उन्होंने (पुरु) बहुत (रेतः) वृष्टि जल (दधिरे) धारण किया है ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर की महिमा से सूर्य की किरणें विशाल आकाश में शब्द करके पार्थिव रस को खींचकर इधर-उधर चेष्टा करती हैं। उससे मेघ, मेघ से वृष्टि होकर संसार का उपकार करती हैं। इसी प्रकार प्रलय के पीछे सृष्टि और सृष्टि के पीछे प्रलय होती है ॥३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−म० १०। सू० ९४ म० ५ ॥