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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्रलय और सृष्टिविद्या का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! (मर्त्यः) मनुष्य ने (ते) तेरे (तन्वः) स्वरूप की (क्रूरम्) क्रूरता को (नहि) नहीं (आनंश) पाया है। (कपिः) कँपानेवाले आप (तेजनम्) प्रकाशमान सूर्यमण्डल को (बभस्ति) खा जाते हैं (इव) जैसे (गौः) गौ (स्वम्) अपनी (जरायु) जरायु को [खा लेती है] ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की अनन्त शक्ति को नहीं जान सकता है। परमेश्वर ही इस संसार को बना कर फिर अपने में प्रविष्ट कर लेता है, जैसे गौ बच्चा उत्पन्न होने के पीछे अपने पेट से निकली झिल्ली को आप निगल जाती है ॥१॥
टिप्पणी: १−(नहि) नैव (ते) तव (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन् (तन्वः) विस्तृतस्य स्वरूपस्य (क्रूरम्) अ० ५।१९।५। क्रूरभावम्। (आनंश) अश्नोतेर्लिट्। परस्मैपदं छान्दसम्। प्राप (मर्त्यः) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति मृङ् प्राणत्यागे−यक्, तुडागमः। मनुष्यः−निघ० २।३। (कपिः) कुण्ठिकम्प्योर्नलोपश्च। उ० ४।१४४। इति कपि चलने−इ। कम्पकः (बभस्ति) भस भर्त्सनदीप्त्योः, अदने च। बभस्तिरत्तिकर्मा−निरु० ५।१२। भक्षयति (तेजनम्) अ० १।२।४। प्रकाशमयं सूर्यमण्डलम् (स्वम्) स्वकीयम् (जरायु) अ० १।११।४। गर्भवेष्टनम् (गौः) प्रसूता धेनुः ॥
