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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - तू (गायत्रच्छन्दाः) गाने योग्य आनन्द कर्मोंवाला (श्येन) महाज्ञानी परमात्मा (असि) है, (त्वा) तुझ को (अनु) निरन्तर (आ रभे) मैं ग्रहण करता हूँ। (मा) मुझ को (अस्य) इस (यज्ञस्य) पूजनीय कर्म को (उदृचि) उत्तम स्तुति में (स्वस्ति) आनन्द से (सम्) यथावत् (वह) ले चल, (स्वाहा) यह आशीर्वाद हो ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमेश्वर के गुण कर्म स्वभाव जान कर पुरुषार्थ करते हैं, वे ही उत्तम कर्मों को समाप्त करके कीर्ति और आनन्द पाते हैं ॥१॥
टिप्पणी: १−(श्येनः) अ० ३।३।३। श्येन आत्मा भवति श्यायतेर्ज्ञानकर्मणः−निरु० १४।१३। महाज्ञानी परमात्मा (असि) (गायत्रच्छन्दाः) अभिनक्षियजि०। उ० ३।१०५। इति गै गाने−अत्रन्, स च णित्। आतो युक् चिण्कृतोः। पा० ७।३।३३। इति−युक्। गायत्रं गायतेः स्तुतिकर्मणः, निरु० १।८। चन्देरादेश्च छः। उ० ४।२१९। इति चदि आह्लादने−असुन् चस्य छः। छन्दति, अर्चतिकर्मा−निघ० ३।१४। गायत्राणि गानयोग्यानि छन्दांस्याह्लादकर्माणि यस्य सः (अनु) पश्चात् निरन्तरम् (त्वा) त्वाम् (आ रभे) परिगृह्णामि। आश्रयामि (स्वस्ति) कल्याणेन (मा) माम् (सम्) सम्यक् (वह) गमय (अस्य) वर्तमानस्य (यज्ञस्य) पूजनीयव्यवहारस्य (उदृचि) उत्तमायां स्तुतौ (स्वाहा) अ० २।१६।१। सुवाणी। आशीर्वादः ॥
