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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
स्वप्न के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यथा यथा) जैसे जैसे (कलाम्) सोलहवाँ अंश और (यथा) जैसे (शफम्) आठवाँ अंश [देकर] (ऋणम्) ऋण को (संनयन्ति) लोग चुकाते हैं। (एव) वैसे ही (सर्वम्) सब (दुःस्वप्न्यम्) नींद में उठे बुरे विचार को (द्विषते) वैरी के लिये (सम् नयामसि) हम यथावत् छोड़ते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे मनुष्य अपने आय का सोलहवाँ वा आठवाँ अंश देकर ऋण चुकाते हैं, वैसे ही स्वप्न के कुविचारों को वैरी पर छोड़ते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यथा यथा) येनैव प्रकारेण (कलाम्) आयस्य षोडशांशम् (शफम्) गवादिपादचतुष्टयस्य द्विखुरत्वाद् एकस्य खुरस्याष्टमांशग्रहणम्। अष्टमांशम् (ऋणम्) पुनर्देयत्वेन गृहीतं धनम् (संनयन्ति) सम्प्रदानेन गमयन्ति (एव) एवम् (दुःस्वप्न्यम्) कुनिद्राभवं विचारम् (सर्वम्) (द्विषते) द्वेष्ट्रे जनाय (सम्) सम्यक् (नयामसि) प्रापयामः ॥
