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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मानसिक पाप के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मणस्पते) हे बड़े-बड़े लोकों के स्वामी (इन्द्र) सम्पूर्ण ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर ! (यत् अपि) जो कुछ भी पाप (मृषा) असत्य व्यवहार से (चरामसि) हम करें। (आङ्गिरसः) ज्ञानियों का हितकारी (प्रचेताः) बड़ी बुद्धिवाला परमात्मा (नः) हमें (दुरितात्) दुर्गति और (अंहसः) पाप से (पातु) बचावे ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य न्यायकारी परमात्मा का ध्यान रखते हैं, वे पापों से बचकर सुखी रहते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यत् अपि) यत्किञ्चिदपि पापम् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् जगदीश्वर (ब्रह्मणस्पतेः) बृहतां लोकानां पालक (मृषा) असत्यव्यवहारेण (चरामसि) चरामः। वयं कुर्मः (प्रचेताः) प्रकृष्टज्ञानोपेतः परमेश्वरः (नः) अस्मान् (आङ्गिरसः) अङ्गिरस्−अण्। अङ्गिरोभ्यो ज्ञानिभ्यो हितः (दुरितात्) दुर्गतेः। कष्टात् (पातु) रक्षतु (अंहसः) पापात् ॥
