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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के नाश के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे पुरुष] (रुद्रस्य) रुलानेवाले भीषण क्लेश का (मूत्रम्) छुड़ाने वा बन्ध करनेवाला बल और (अमृतस्य) अमरपन वा मुक्ति का (नाभिः) मध्यस्थ (असि) तू है। (विषाणका) विषाणका, विविध भक्ति का उपदेश करनेवाली (नाम) प्रसिद्ध (पितॄणाम्) पालन करनेवाले गुणों के (मूलात्) मूल से [आदि कारण परमेश्वर से] (उत्थिता) प्रकट हुई और (वातीकृतनाशनी) हिंसा कर्म की नाश करनेवाली शक्ति (वै) निश्चय करके (असि) तू है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अनेक क्लेशों को सहते हैं और परमेश्वर का विश्वास करते हैं, वे ही सब प्रकार का सुख प्राप्त करते हैं ॥३॥ विषाण और विषाणिका ओषधिविशेष भी हैं ॥
टिप्पणी: ३−(रुद्रस्य) रोदेर्णिलुक् च। उ० २।२२। इति रोदयते−रक्। रुद्रो रौतीति सतो रोरूयमाणो द्रवतीति वा रोदयतेर्वा। निरु० १०।५। रोदकस्य भीषणक्लेशस्य (मूत्रम्) सिविमुच्योष्टेरू च। उ० ४।१६३। इति मुच्लृ मोक्षणे−ष्ट्रन्, टेः ऊ। यद्वा, मूङ् बन्धने−ष्ट्रन्। मोचकम्। मावकबन्धकबलम् (अमृतस्य) मोक्षस्य (नाभिः) मध्यस्थानम् (विषाणका) वि+षण सम्भक्तौ−घञ्। आतोऽनुपसर्गे कः। पा० ३।२।३। इति विषाण+कै शब्दे−क। टाप्। उपपदमतिङ्। पा० २।२।१९। इति समासः। विषाणं विविधं सम्भजनं काययति कथयति या सा शक्तिः (नाम) प्रसिद्धौ (वै) निश्चयेन (असि) (पितॄणाम्) पालकगुणानाम् (मूलात्) आदिकारणात् परमेश्वरात् (उत्थिता) प्रादुर्भूता (वातीकृतनाशनी) वातेर्नित्। उ० ५।६। इति वा गतिहिंसनयोः−अति। छान्दसो दीर्घः। वातेर्हिंसायाः कृतस्य कर्मणो नाशयित्री ॥
