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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के नाश के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (ते) तेरे लिये (या) जो (शतम्) सौ (च) और (सहस्रम्) सहस्र (भेषजानि) ओषधियाँ (संगतानि) परस्पर मेलवाली हैं, [उनमें से] (वसिष्ठम्) अतिशय धनी वा निवास करनेवाला ब्रह्म (श्रेष्ठम्) अति श्रेष्ठ (आस्रावभेषजम्) रुधिर के बहाव वा घाव की औषध और (रोगनाशनम्) रोगों का नाश करनेवाला है ॥२॥
भावार्थभाषाः - योगीजन सब पदार्थों से गुण ग्रहण करके उस परब्रह्म की आज्ञापालन से सदा स्वस्थ और सुखी रहते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(शतम्) (या) यानि (भेषजानि) भयनिवर्त्तकानि। औषधानि (ते) तुभ्यम् (सहस्रम्) बहूनि (संगतानि) परस्परमिलितानि (च) (श्रेष्ठम्) सर्वेषां प्रशस्ततमम् (आस्रावभेषजम्) आस्रावः−अ० १।२।४। आङ्+स्रु स्रवणे−ण। आस्रावस्य रुधिरादिस्रवणस्य आघातस्य वौषधम् (वसिष्ठम्) अ० ४।२९।३। अतिशयेन धनयुक्तम्। वस्तृतमं ब्रह्म (रोगनाशनम्) सर्वव्याधिनाशकम् ॥
