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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
क्रोध की शान्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) यह (दर्भः) दर्भ अर्थात् दुःख नाश करनेवाला वा सुकर्म गूँथनेवाला पुरुष (स्वाय) अपने समुदाय के लिये (च च) और (अरणाय) प्राप्ति योग्य शूद्र अन्त्यज आदि के लिये (विमन्युकः) क्रोध हटानेवाला है। (अयम्) यह (मन्योः) क्रोधी का (विमन्युकः) क्रोध दूर करनेवाला और (मन्युशमनः) क्रोध शान्त करनेवाला (उच्यते) कहा जाता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को योग्य है कि बड़े और छोटों से शान्तचित्त होकर बर्ताव करे ॥१॥ (दर्भ) अर्थात् कुश घास औषधविशेष भी है, जो वात पित्त कफ त्रिदोष आदि रोग नाश करता है ॥
टिप्पणी: १−(अयम्) पुरोवर्ती (दर्भः) दृदलिभ्यां भः। उ० ३।१५१। इति दॄ विदारणे−भ। यद्वा। दृभो ग्रन्थे−घञ्। दुःखविदारकः। सुकर्मग्रन्थकः (विमन्युकः) शेषाद् विभाषा। पा० ५।४।१५४। इति कप्। वि विगमितो मन्युर्येन सः। क्रोधनिवारकः (स्वाय) ज्ञातये (च च) समुच्चये (अरणाय) ऋ गतौ−ल्यु। प्राप्तव्याय शूद्रान्त्यजादये (मन्योः) मतुपो लोपः। मन्युमतः पुरुषस्य (विमन्युकस्य) सुपां सुपो भवन्तीति वक्तव्यम्। वा० पा० ७।१।३९। इति प्रथमार्थे षष्ठी। विमन्युकः। क्रोधनिवारकः (अयम्) (मन्युशमनः) क्रोधशान्तिकरः (उच्यते) अभिधीयते ॥
