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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
क्रोध की शान्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (ते) तेरे (मन्युम्) क्रोध को [तेरी] (पार्ष्ण्या) एड़ी से (च) और (प्रपदेन) ठोकर से (अभि तिष्ठामि) मैं दबाता हूँ। (यथा) जिस से (अवशः) परवश (न=न भूत्वा) न होकर (वादिषः) तू बातचीत करे, (मम) मेरे (चित्तम्) चित्त में (उप−आयसि) तू पहुँच करता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य क्रोधवश न होकर परस्पर शान्तचित्त रहें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(अभि तिष्ठामि) अभिभवामि (ते) तव (मन्युम् क्रोधम्) (पार्ष्ण्या) पादापरभागेन (प्रपदेन) पादाग्रेण (यथा) येन प्रकारेण (अवशः) परवशः। क्रोधवशः (न) न भूत्वा (वादिषः) वदेर्लेटि अडागमः, सिप् च। त्वं ब्रूयाः (मम) (चित्तम्) अन्तःकरणम् (उप−आयसि) अ० १।३४।२। उपागच्छसि। आदरेण सर्वतः प्राप्नोषि ॥
