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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
क्रोध की शान्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सखायौ इव) दो मित्रों के समान (सचावहै) हम दोनों मिले रहें, (ते) तेरे (मन्युम्) क्रोध को (अव तनोमि) मैं उतारता हूँ। (ते) तेरे (मन्युम्) क्रोध को (अश्मनः) उस पत्थर के (अधः) नीचे (उप अस्यामसि) दबाकर हम गिराते हैं (यः) जो (गुरुः) भारी [पत्थर] है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य क्रोध छोड़कर परस्पर प्रीति से रहें ॥२॥
टिप्पणी: २−पूर्वार्धो यथा म० १। (अधः) अधस्तात् (ते) तव (अश्मनः) पाषाणस्य (मन्युम्) क्रोधम् (उप) उपेत्य (अस्यामसि) क्षिपामः (यः) अश्मा (गुरुः) भारोपेतः ॥
