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अव॒ ज्यामि॑व॒ धन्व॑नो म॒न्युं त॑नोमि ते हृ॒दः। यथा॒ संम॑नसौ भू॒त्वा सखा॑याविव॒ सचा॑वहै ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अव । ज्याम्ऽइव । धन्वन: । मन्युम् । तनोमि । ते । हृद: । यथा । सम्ऽमनसौ । भूत्वा । सखायौऽइव । सचावहै ॥४२.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:42» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

क्रोध की शान्ति के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (ते) तेरे (हृदः) हृदय से (मन्युम्) क्रोध को (अव तनोमि) मैं उतारता हूँ, (इव) जैसे (धन्वनः) धनुष से (ज्याम्) डोरी को। (यथा) जिस से (समनसौ) एकमन (भूत्वा) होकर (सखायौ इव) दो मित्रों के समान (सचावहै) हम दोनों मिले रहें ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को ईर्ष्या द्वेष छोड़कर सदा मित्र होकर रहना चाहिये ॥१॥
टिप्पणी: १−(ज्याम्) अ० १।१।३। मौर्वीम् (इव) यथा (धन्वनः) धनुषः (मन्युम्) क्रोधम् (अव तनोमि) अवरोपयामि। अवतरामि (ते) तव (हृदः) हृदयात् (यथा) येन प्रकारेण (संमनसौ) समानमनस्कौ परस्परानुरागिणौ (भूत्वा) (सखायौ) सुहृदौ (सचावहै) षच समवाये−लोट्। समवेतौ नित्यसंगतौ भवाव ॥