आत्मा की उन्नति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (दैव्याः) दिव्यगुणवाले (ऋषयः) व्यापनशील वा दर्शनशील [अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि, अथवा दो कान दो नथने, दो आँख और मुख] (नः) हमें (मा हासिषुः) न त्यागें, (ये) जो (तनूपाः) शरीर की रक्षा करने हारे और (ये) जो (नः) हमारे (तन्वः) शरीर के (तनूजाः) विस्तार के साथ उत्पन्न हुए हैं। (अमर्त्याः) हे अमर ! [नित्य उत्साहियो] (मर्त्यान्) मरते हुए [निरुत्साही] मनुष्यों के हित करनेवाले (नः) हम से (अभि) सब ओर से (सचध्वम्) मिले रहो, और (नः) हमें (प्रतरम्) अधिक श्रेष्ठ (आयुः) आयु (जीवसे) जीवन के लिये (धत्त) दान करो ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ब्रह्मचर्य, योगाभ्यास, विद्याप्राप्ति आदि कर्मों से हृष्ट-पुष्ट रह कर संसार का उपकार करके कीर्ति पावें ॥३॥ यह मन्त्र स्वामी दयानन्द कृतसंस्कारविधि, जातकर्म में आशीर्वाद का है ॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥