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अ॑पा॒नाय॑ व्या॒नाय॑ प्रा॒णाय॒ भूरि॑धायसे। सर॑स्वत्या उरु॒व्यचे॑ वि॒धेम॑ ह॒विषा॑ व॒यम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अपानाय । विऽआनाय । प्राणाय । भूरिऽधायसे । सरस्वत्यै । उरुऽव्यचे । विधेम । हविषा । वयम् ॥४१.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:41» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आत्मा की उन्नति का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अपानाय) बाहिर निकलनेवाले अपानवायु के लिये, (व्यानाय) शरीर में व्यापक व्यान वायु के लिये, (भूरिधायसे) अनेक प्रकार से धारण करनेवाले (प्राणाय) जीवनवायु प्राण के लिये और (उरुव्यचे) दूर-दूर तक फैलनेवाले (सरस्वत्यै) विज्ञानवती सरस्वती [विद्या] के लिये (वयम्) हम लोग (हविषा) भक्ति से [परमेश्वर को (विधेम) पूजें ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर को आत्मसमर्पण करके आत्मा और शरीर से स्वस्थ रहकर अनेक प्रकार से विज्ञान प्राप्त करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(अपानाय) शरीराद्बहिर्गन्त्रे वायवे (व्यानाय) शरीरव्यापकाय पवनाय (प्राणाय) जीवनसाधनाय समीराय (भूरिधायसे) अ० १।२।१। बहुपोषकाय (सरस्वत्यै) विज्ञानवत्यै विद्यायै (उरुव्यचे) अ० ५।३।८। उरु+वि+अच गतौ−विच्। बहुलं व्याप्नुवत्यै। अन्यत् पूर्ववत् ॥