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सिं॒हे व्या॒घ्र उ॒त या पृदा॑कौ॒ त्विषि॑र॒ग्नौ ब्रा॑ह्म॒णे सूर्ये॒ या। इन्द्रं॒ या दे॒वी सु॒भगा॑ ज॒जान॒ सा न॒ ऐतु॒ वर्च॑सा संविदा॒ना ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सिंहे । व्याघ्रे । उत । या । पृदाकौ । त्विषि: । अग्नौ । ब्राह्मणे । सूर्ये । या । इन्द्रम् । या । देवी । सुऽभगा । जजान । सा । न: । आ । एतु । वर्चसा । सम्ऽविदाना ॥३८.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:38» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ऐश्वर्य पाने के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (या) जो (त्विषिः) ज्योति (सिंहे) सिंह में, (व्याघ्रे) बाघ में (उत) और (पृदाकौ) फुँसकारते हुए साँप में, और (या) जो (अग्नौ) अग्नि में, (ब्राह्मणे) वेदवेत्ता पुरुष में और (सूर्ये) सूर्य में है, (या) जिस (देवी) दिव्य गुणवाली, (सुभगा) बड़े ऐश्वर्यवाली [ज्योति] ने (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य को (जजान) उत्पन्न किया है, (सा) वह (वर्चसा) अन्न से (संविदाना) मिलती हुई (नः) हमें (आ) आकर (एतु) मिले ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य संसार के सब बलवान् तेजस्वी पदार्थों में संयम करके ऐश्वर्य और पराक्रम प्राप्त करे ॥१॥ यही भावार्थ अगले मन्त्रों भी समझो ॥
टिप्पणी: १−(सिंहे) अ० ४।८।७। हिंसके जन्तौ (व्याघ्रे) अ० ४।३।१। शार्दूले (उत) अपि (या) (पृदाकौ) अ० ३।२७।३। कुत्सितशब्दकारिणि सर्पे (त्विषिः) इगुपधात् कित्। उ० ४।१२०। इति त्विष दीप्तौ−इन् कित्। कान्तिः। उत्साहशक्तिः (अग्नौ) पावके (ब्राह्मणे) अ० २।६।३। वेदज्ञे पुरुषे (सूर्य्ये) आदित्ये (या) (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यम् (देवी) दिव्यगुणा (सुभगा) बह्वैश्वर्ययुक्ता (जजान) जनयामास (सा) त्विषिः (नः) अस्मान् (आ) आगत्य (एतु) प्राप्नोतु (वर्चसा) अन्नेन−निघ० २।७। (संविदाना) अ० २।१८।२। संगच्छमाना ॥