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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
कुवचन के त्याग का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शपथ) हे शान्तिमार्ग दिखानेवाले राजन् ! (न) हमें (परि वृङ्धि) छोड़ दे (इव) जैसे (दहन्) जलता हुआ (अग्निः) अग्नि (ह्रदम्) अथाह झील को [छोड़ जाता है]। (अत्र) यहाँ पर (नः) हमारे (शप्तारम्) कोसनेवाले को (जहि) नाश करदे, (इव) जैसे (दिव) आकाश से (अशनिः) बिजुली (वृक्षम्) स्वीकरणीय वृक्ष को ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा दुष्टों के कलङ्क लगाने से धर्म्मात्माओं की रक्षा करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(परि) सर्वतः (नः) अस्मान् (वृङ्धि) अ० १।२५।१। वर्जय (शपथ) म० १। हे शान्तिपथदर्शक (ह्रदम्) ह्राद स्वने−अच्। अगाधजलाशयम् (अग्निः) पावकः (इव) यथा (दहन्) भस्मीकुर्वन् (शप्तारम्) कुभाषिणम् (अत्र) अस्मिन् राज्ये (नः) अस्माकम् (जहि) नाशय, (दिवः) आकाशात् (वृक्षम्) स्वीकरणीयं द्रुमम् (इव) यथा (अशनिः) विद्युत् ॥
