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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कामः) कामना के योग्य, (एकः) एक (सम्राट्) राजाधिराज (अग्निः) सर्वव्यापक परमात्मा (भूतस्य) बीते हुए और (भव्यस्य) होनहार काल के (परेषु) दूर-दूर (धामसु) धामों में (वि) विविध प्रकार (राजति) राज करता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! उस परमात्मा की उपासना करके अपनी उन्नति करो, जो अकेला ही इस सब संसार का स्वामी है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(अग्निः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः (परेषु) दूरेषु (धामसु) स्थानेषु (कामः) कमु कान्तौ−घञ्। कमनीयः (भूतस्य) अतीतस्य (भव्यस्य) भविष्यतः कालस्य (सम्राट्) राजाधिराज (एकः) अद्वितीयः (वि) विविधम् (राजति) ईष्टे ॥
