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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) वह (विश्वा प्रति) सब लोकों में व्यापकर (चक्लृषे) समर्थ हुआ है, (वशी) वह वश में रखनेवाला (यज्ञस्य) पूजनीय व्यवहार के (वयः) बल को (उत्तिरन्) बढ़ाता हुआ (ऋतून्) सब ऋतुओं को (उत्) उत्तमता से (सृजते) बनाता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा मनुष्य के सुख के लिये उत्तम-उत्तम पदार्थ और सब ऋतुएँ बनाता है, उसकी स्तुति सदा करनी चाहिये ॥२॥
टिप्पणी: २−(सः) परमेश्वरः (विश्वा) सर्वाणि भुवनानि (प्रति) व्याप्य (चक्लृषे) कृपू सामर्थ्ये−लिट्। समर्थो बभूव (ऋतून्) वसन्तादिकालावयवान् (उत्) उत्कर्षेण (सृजते) निर्मिमीते (वशी) वशयिता। स्वतन्त्रः (यज्ञस्य) पूजनीयव्यवहारस्य (वयः) अ० २।१०।३। सामर्थ्यम् (उत्तिरन्) तॄ प्लवनतरणयोः−शतृ। ॠत इद्धातोः। पा० ७।१।१००। इति इकारः। प्रवर्धयन् ॥
