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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो परमेश्वर (परस्याः) दूर दिशा के भी (परावतः) दूर स्थान से (धन्व) अन्तरिक्ष को (तिरः=तिरस्कृत्य) पार करके (अतिरोचते) अत्यन्त चमकता है। (सः) वह (द्विषः) वैरियों को (अति) उलाँघ कर (नः) हमें (पर्षत्) भरपूर करे ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर दूर और समीप सब स्थान में हमारी रक्षा करता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यः) परमेश्वरः (परस्या) दूरदिशायाः (परावतः) अ० ३।४।५। दूरगतात् स्थानात् (तिरः) तिरस्कृत्य, अन्तर्धाय (धन्व) अ० ४।४।७। अन्तरिक्षम्−निघ० १।३। (अतिरोचते) अतिशयेन दीप्यते। अन्यद् गतम् ॥
