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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो (अग्निः) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (तिग्मेन) तीव्र (शोचिषा) तेज से (रक्षांसि) राक्षसों को (निजूर्वति) मार गिराता है। (स) वह (द्विषः) वैरियों को (अति) उलाँघ कर (नः) हमें (पर्षत्) भरपूर करे ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे अग्नि के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है, वैसे ही मनुष्य परमेश्वर के ज्ञान से अज्ञान मिटावें ॥२॥
टिप्पणी: २−(रक्षांसि) राक्षसान्। दारिद्र्यादिदोषान् (निजूर्वति) जुर्व वधे। निहन्ति (तिग्मेन) तीक्ष्णेन (शोचिषा) तेजसा। अन्यद् गतम् ॥
