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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सूर्य वा भूमि के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणात्) भीतर की श्वास के पीछे (अपानतः) बाहर को श्वास निकालते हुए (अस्य) इस [सूर्य] की (रोचना) रोचक ज्योति (अन्तः) [जगत् के] भीतर (चरति) चलती है, और वह (महिषः) बड़ा सूर्य्य (स्वः) आकाश को (वि) विविध प्रकार (अन्यत्) प्रकाशित करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे सब प्राणी श्वास-प्रश्वास से जीवित रह कर चेष्टा करते हैं, वैसे ही सूर्य प्रकाश का ग्रहण और त्याग करके लोकों को प्रकाशित करता है ॥२॥ महर्षि दयानन्दकृत भाष्य, यजुर्वेद ३।७। (प्राणात्) ब्रह्माण्ड और शरीर के बीच में ऊपर जानेवाले वायु से (अपानतः) नीचे को जानेवाले वायु को उत्पन्न करते हुए (अस्य) इस अग्नि की (रोचना) दीप्ति अर्थात् बिजुली (अन्तः) ब्रह्माण्ड और शरीर के मध्य (चरति) चलती है, वह (महिषः) अपने गुणों से बड़ा अग्नि (स्वः) सूर्य लोक को (व्यख्यत्) प्रकट करता है ॥२॥ सब प्राणियों के भीतर रहनेवाली अग्नि की कान्ति बिजुली प्राण और अपान के साथ मिलकर सब चेष्टाओं को सिद्ध करती है ॥
टिप्पणी: २−(अन्तः) लोकमध्ये (चरति) गच्छति (रोचना) कान्तिः (अस्य) पृश्नेः−म० १। सूर्यस्य (प्राणात्) श्वासव्यापारादनन्तरम् (अपानतः) प्रश्वासं कुर्वतः (वि) विविधम् (अख्यत्) ख्या प्रकथने−लडर्थे लुङ्, अन्तर्गतण्यर्थः। ख्यापयति प्रकाशयति (महिषः) अ० २।३५।४। महान् सूर्यः (स्वः) आकाशम् ॥
