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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्या के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (बृहत्पलाशे) हे बहुत पालन शक्ति से व्याप्त ! (सुभगे) हे बड़े ऐश्वर्यवाली ! (वर्षबुद्धे) हे वरणीय गुणों से बढ़ी हुई ! (ऋतावरि) हे सत्यशीला ! (शमि) हे शान्तिकारिणी सरस्वती ! (केशेभ्यः) प्रकाशों के लिये (मृड) सुखी हो, (माता इव) जैसे माता (पुत्रेभ्यः) पुत्रों के लिये ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य सत्कारपूर्वक विद्या को प्राप्त करते हैं, उन्हें वह ऐसे सुख देती है जैसे माता पुत्रों को ॥३॥
टिप्पणी: ३−(बृहत्पलाशे) पल रक्षणे−अप्+अशूङ् व्याप्तौ संघाते च−अण्। बहूनि पलानि पालनानि अश्नुते व्याप्नोति सा। तत्सम्बुद्धौ, (सुभगे) हे बह्वैश्वर्यवति (वर्षवृद्धे) वृतॄवदि०। उ० ३।६२। इति वृञ् वरणे−स प्रत्ययः। वर्षैर्वरणीयगुणैः प्रवृद्धे (ऋतावरि) अ० ५।१५।१। हे सत्यशीले (माता इव) जननी यथा (पुत्रेभ्यः) सन्तानेभ्यः (मृड) सुखयुक्ता भव (केशेभ्यः) म० २ प्रकाशेभ्यः (शमि) हे शान्तिकारिणि सरस्वति ॥
