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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शुभ गुण ग्रहण करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पतत्रिणी) नीचे गिरनेवाली (हेतिः) चोट (अमून्) उन [शत्रुओं] को (नि) नीचे (एतु) ले जावे। (उलूकः) अज्ञान से ढकनेवाला उल्लू के समान मूर्ख पुरुष (यत्) जो कुछ (वदति) बोलता है, (एतत्) वह (मोघम्) निरर्थक होवे। (यत्) क्योंकि (कपोतः) स्तुति योग्य अथवा कबूतर के समान तीव्र बुद्धि पुरुष (अग्नौ) विद्वानों के समूह में (वा) निश्चय करके (पदम्) अधिकार (कृणोति) करता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - जहाँ पर विद्वान् मनुष्य अधिकारी होते हैं, वहाँ पर मूर्ख शत्रुओं के वचन और कर्म निष्फल होते हैं ॥१॥ इस मन्त्र का दूसरा और तीसरा पाद ऋग्वेद में है−म० १०।१६५ ॥४॥
टिप्पणी: १−(अमून्) धर्माद् दूरे वर्तमानान् शत्रून् (हेतिः) हवनशक्तिः (पतत्रिणी) अधोगामिनी (नि) नीचैः (एतु) अन्तर्गतण्यर्थः। गमयतु (यत्) यत्किञ्चित् (उलूकः) उलूकादयश्च। उ० ४।४१। इति वल संवरणे, ऊक। अज्ञानेनाच्छादकघूकवद् मूर्खः शत्रुः (वदति) कथयति (मोघम्) मुह अविवेके−घञ्, कुत्वम्। अनर्थकम् (एतत्) वचनम् (यत्) यस्मात् (वा) अवधारणे (कपोतः) सू० २७।१। स्तुत्यः पुरुषः। यद्वा कपोतवत् तीव्रबुद्धिः (पदम्) अधिकारम् (अग्नौ) विद्वत्समूहे (कृणोति) करोति ॥
