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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग के नाश के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सप्त) सात (च च) और (सप्ततिः) सत्तर (याः) जो पीड़ायें (ग्रैव्याः अभि) कण्ठ की नाड़ियों में (संयन्ति) सब ओर से व्यापती हैं (ताः सर्वाः) वे सब म० १ ॥२॥
भावार्थभाषाः - मन्त्र १ के समान ॥२॥
टिप्पणी: २−(सप्त च सप्ततिश्च) सप्ताधिकसप्ततिसंख्यकाः (ग्रैव्याः) गम्भीराञ्ञ्यः। पा० ४।३।५८। इति बाहुलकात् ग्रीवा−ञ्य। ग्रीवासु भवा नाडीः। अन्यत्पूर्ववत् ॥
