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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आपः) व्यापक शक्तियाँ [वा जलधारायें] (हिमवतः) वृद्धिशील वा गतिशील परमेश्वर से [वा हिमवाले पहाड़ से] (प्रस्रवन्ति) बहती रहती हैं, और (समह) हे महिमा के साथ वर्तमान पुरुष ! (सिन्धौ) बहनेवाले संसार [वा समुद्र] में (सङ्गमः) उनका सङ्गम है। (देवीः) वे दिव्य गुणवाली शक्तियाँ [वा जलधारायें] (ह) निश्चय करके (मह्यम्) मेरे लिये (तत्) वह (हृद्द्योतभेषजम्) हृदय की चमक का भय जीतनेवाला औषध (ददन्) देवें ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की उपकार शक्तियों को विचार कर अपने दोष मिटावें, अथवा जल द्वारा रोगनाश करें ॥१॥
टिप्पणी: १−(हिमवतः) अ० ५।४।२। हि गतौ वृद्धौ च−मक्। गतिशीलाद् वृद्धिशीलाच्च परमेश्वरात् हिमयुक्तात् पर्वतात् (प्र) प्रकर्षेण (स्रवन्ति) वहन्ति (सिन्धौ) अ० ४।३।१। स्यन्दनशीले संसारे सागरे वा (समह) अ० ५।४।१०। हे महेन महिम्ना सह वर्तमान (संगमः) संसर्गः (आपः) अ० १।४।३। व्यापिकाः परमेश्वरशक्तयो जलधारा वा (ह) अवश्यम् (मह्यम्) उपासकाय (तत्) प्रसिद्धम् (देवीः) देव्यः। दिव्याः (ददन्) लेटि रूपम्। ददतु (हृद्द्योतभेषजम्) हृदयदाहनिवर्तकमौषधम् ॥
