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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इमाः) यह (याः) जो (तिस्रः) तीन [सूर्य, पृथिवी और अन्तरिक्ष] (पृथिवीः) विस्तृत लोक हैं, (तासाम्) उन में (ह) निश्चय करके (भूमिः) भूमि, सब का आधार परमेश्वर (उत्तमा) उत्तम है। (तासाम्) उन [लोकों] के (त्वचः अधि) विस्तार के ऊपर (भेषजम्) भयनाशक ब्रह्म को (उ) अवश्य (अहम्) मैंने (सम् जग्रभम्) यथावत् ग्रहण किया ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर के रचे लोक-लोकान्तरों के सम्बन्ध और गुणों को जान कर परस्पर उपकार करें ॥१॥
टिप्पणी: १−(इमाः) दृश्यमानाः (याः) (तिस्रः) त्रिसंख्याका द्यावापृथिव्यन्तरिक्षरूपाः (पृथिवीः) पृथिव्यः। विस्तृता लोकाः (तासाम्) लोकानां मध्ये (ह) खलु (भूमिः) भुवः कित्। उ० ४।४५। इति भू सत्तायाम्−मि। भवन्ति सर्वे लोका यस्यां सा। परमेश्वरः (उत्तमा) श्रेष्ठा (अधि) उपरि (त्वचः) तनोतेरनश्च वः। उ० २।६३। इति तनु विस्तारे−चिक्। विस्तारात् (अहम्) ब्रह्मज्ञानी (भेषजम्) भेषस्य भयस्य जेतृ ब्रह्म (सम्) सम्यक् (उ) अवश्यम् (जग्रभम्) ग्रहः स्वार्थण्यन्तात् लुङि चङि छान्दसं रूपम्। गृहीतवानस्मि ॥
